
आज (6 दिसंबर 2025) पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा (Beldanga) में हुमायूं कबीर ने इस विवादित मस्जिद की नींव रखी है।
समारोह शुरू से ही भारी सुरक्षा के बीच हुआ — पुलिस, Rapid Action Force (RAF), केंद्र और राज्य की सुरक्षा एजेंसियों को हाईवे-12 एवं आसपास के इलाकों में तैनात किया गया था।
नींव-राखने के पहले, दो धार्मिक विद्वानों के साथ कुरान पाठ हुआ और उसके बाद ही पत्थर रखकर औपचारिक शुरुआत की गई। मौके पर “नारा-ए-तकबीर, अल्लाहू अकबर” जैसे नारे भी लगे।
राजनीतिक व सामाजिक हलचल संवेदनशील और विवादित कदम
हुमायूं कबीर को उनकी इस पहल के कारण हाल ही में टीएमसी से निलंबित किया जा चुका था, क्योंकि पार्टी ने इसे “सांप्रदायिक राजनीति” करार दिया।
हालांकि उन्होंने कहा है कि मस्जिद बनाना उनका संवैधानिक अधिकार है, और उन्होंने विश्वास जताया कि पश्चिम बंगाल में रहने वाले मुसलमानों की आबादी (लगभग 37%) इस परियोजना की मजबूती को लेकर साथ है।
विपक्षी दलों और आलोचकों ने इस कदम को “वोट बैंक राजनीति” और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश बताया है।
मस्जिद मात्र पूजा स्थल नहीं, बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा
कबीर ने कहा है कि यह सिर्फ एक मस्जिद नहीं होगी — मस्जिद परिसर में 300-बेड का अस्पताल, स्कूल, होटल और हेलीकॉप्टर पैड सहित अन्य सुविधाएँ भी होंगी। यह अनुमानित लागत ₹300 करोड़ बताई जा रही है।
प्रस्तावित भूमि लगभग 25 एकड़ है, जिसमें मुख्य मस्जिद तीन एकड़ में होगी। अन्य सुविधाओं के लिए बाकी क्षेत्र इस्तेमाल किया जाएगा।
न्यायपालिका और प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौतियाँ
समारोह से एक दिन पहले, Calcutta High Court (कोलकाता हाई कोर्ट) ने कहा कि वह मस्जिद के निर्माण को रोकने का आदेश नहीं देगी; लेकिन कार्यक्रम के दौरान कानून और秩序 बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकार और पुलिस पर छोड़ी गई।
प्रशासन की ओर से हाई अलर्ट जारी था — कई सुरक्षाबलों को तैनात किया गया था, ताकि किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक हिंसा या अशांति न हो सके।
आगे की राजनीति और सामाजिक असर क्या बदलने वाला है?
यह कदम मुर्शिदाबाद और आसपास के इलाकों में राजनीतिक व communal समीकरणों को बदलने की आशंका के साथ लिया गया है। 2026 के निर्वाचन (विधानसभा चुनाव) को देखते हुए यह मस्जिद निर्माण प्रस्ताव संवेदनशील साबित हो सकता है।
दूसरी ओर, यदि मस्जिद + अस्पताल + स्कूल जैसी सुविधाओं का वादा पूरा होता है, तो इसे मुसलिम समाज में सामाजिक-आर्थिक जरूरतों के रूप में देखा जा सकता है।
हालांकि, आलोचक कह रहे हैं कि इसे धार्मिक प्रतीकवाद और वोट बैंक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिससे धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ने का खतरा है।








